आवारा मसीहा
Tuesday, February 2, 2010
पढाई का बोझ.............

लगता है सही मायनो में 3 इडियटस फिल्म का अर्थ, केंद्रीय विद्यालय संगठन ही समझ पाया है। केंद्रीय विद्यालय संगठन द्वारा कक्षा के हिसाब से बस्ते का भार तय किया जाना शायद विद्यार्थियों का कुछ भार कम कर दे।
बचपन से ही किताबों के बीच उलझा हुआ बच्चा अपनी प्रतिभा को पहचान नही पाता, न ही अपना लक्ष्य तय कर पाता है। किताबों के बीच घिरा होने के कारण वह खेल कूद, तथा अन्य कई चीजो से वंचित रह जाता हैं। बचपन से ही माँ-बाप का सपना पूरा करने की जिद में उसका अपना सपना तो कही खो सा जाता है। इसके लिये सिर्फ माँ- बाप या कोई एक व्यक्ति नही है,बल्कि पूरा समाज इसके लिये जिम्मेदार है।
हम रटते-पढ़ते जिन्दगी की दौड़ में आगे तो निकल जाते हैं, पर पीछे मुड़ कर देखने पर कुछ नजर नही आता है। किताबें ज्ञान का भंडार तो हैं, पर इस भंडार में कहीं न कहीं किसी मासूम का बचपन दबा हुआ है।
रह गया अकेला यहीं,प्रतियोगीता कि होड़ में।
क्या मेरा अधूरा बचपन कभी लौट कर आयेगा,
यह सवाल अब उम्र भर मुझे चोट पहुचायेगा .

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