
मुद्रास्फीति की दर में अप्रत्याशित उछाल आने के बाद सप्रंग शासन तंत्र में हड़कंप मचना ही था लेकिन इस हाय तौबा में भी सरकार महंगाई पर काबू पाने में सफल नही हो पाई है। महंगाई रूपी घोड़े की लगाम खींचने के बजाये नेतागड़ मीडिया को खींच कर घिसे पिटे बयान देने में अधिक रूचि दिखा रहे है । गनीमत है की अभी तक केन्द्र सरकार ने पूर्णतया पल्ला नही झाड़ा है । वित्त मंत्री अभी भी अपनी जादू की छड़ी का छलावा पेश करते रहते है । भले ही सप्रंग सरकार बड़े बड़े अर्थशास्त्रियों से भरी है परन्तु प्रतीत होता है कि वे सभी मात्र किताबी विद्वान है क्यूंकि यदि उन्हें व्यावहारिक अर्थशास्त्र की तनिक भी समझ होती तो देश की जनता महंगाई की मार से बची रहती।
सप्रंग सरकार के स्तंभ वाम दल भी ऐसे प्रदर्शन कर रहे है जैसे उनका इस मसले से कोई लेना देना ही नही है । महंगाई की जो मार आम जनता झेल रही है वास्तव में एक दिन की उपज नही है । खाद्यानों का आभाव ,कृषि के प्रति भेदभावपूर्ण रीति तथा आर्थिक व् प्रशासनिक सुधारो का ठंडे बसते में जाना इस बात का संकेत था की देश महंगाई की इस विकराल समस्या से ग्रसित होने वाला है लेकिन सरकार ऐसे ज़ाहिर कर रही है मानो महंगाई आस्मां से अचानक टपक पड़ी हो । जबकि सच तो यह है की महंगाई से निपटने की माँ तो पहले कोई तयारी थी और न अब है । यह तो वही हाल हो गया -
"अंधेर नगरी चौपट राजा ,
सौ सेर भाजी सौ सेर खाजा"
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