आवारा मसीहा
Wednesday, February 3, 2010
मेरा दोष है..........
Tuesday, February 2, 2010
पढाई का बोझ.............

लगता है सही मायनो में 3 इडियटस फिल्म का अर्थ, केंद्रीय विद्यालय संगठन ही समझ पाया है। केंद्रीय विद्यालय संगठन द्वारा कक्षा के हिसाब से बस्ते का भार तय किया जाना शायद विद्यार्थियों का कुछ भार कम कर दे।
बचपन से ही किताबों के बीच उलझा हुआ बच्चा अपनी प्रतिभा को पहचान नही पाता, न ही अपना लक्ष्य तय कर पाता है। किताबों के बीच घिरा होने के कारण वह खेल कूद, तथा अन्य कई चीजो से वंचित रह जाता हैं। बचपन से ही माँ-बाप का सपना पूरा करने की जिद में उसका अपना सपना तो कही खो सा जाता है। इसके लिये सिर्फ माँ- बाप या कोई एक व्यक्ति नही है,बल्कि पूरा समाज इसके लिये जिम्मेदार है।
हम रटते-पढ़ते जिन्दगी की दौड़ में आगे तो निकल जाते हैं, पर पीछे मुड़ कर देखने पर कुछ नजर नही आता है। किताबें ज्ञान का भंडार तो हैं, पर इस भंडार में कहीं न कहीं किसी मासूम का बचपन दबा हुआ है।
रह गया अकेला यहीं,प्रतियोगीता कि होड़ में।
क्या मेरा अधूरा बचपन कभी लौट कर आयेगा,
यह सवाल अब उम्र भर मुझे चोट पहुचायेगा .
Sunday, September 20, 2009

मैं समझता हूँ हमारे भारतवासी बहुत नादान हैं किसी के भी बहकावे में आने में इन्हे वक्त नही लगता है । जैसे ही कोई नेता अपना वोट बैंक बढ़ने के लिए जाती और धर्म क नाम पर बरगलाता है वैसे ही ये सरे काम काज छोड़ तुंरत दूसरो की निंदा करने में लग जाते हैं। ये भूल जाते हैं की हम भारतीये हैं इन्हे सिर्फ़ अपने मूल की ही चिंता रहती है।बस मेरा सवाल ये है की हम कब समझेंगे की हमें अब धर्म या राज्य क नाम पर लड़ना बंद कर देना चाहिए । यह पूरा देश ही हमारा घर है और हमें मिलकर इसके विकास का पथ तयार करना चाहिए।
Friday, July 11, 2008
यह कैसा जागरण ???
"पुण्य " कमाने और "फल "पाने के लिए लोगों ने कई साधन अपना रखे है। इन्ही में से एक प्रमुख साधन है-भगवती जागरण। इन जागरणों में रात रात भर जाग कर अन्य किसी को कुछ हासिल होता हो या ना होता हो,मगर जागरण करने वाली पार्टियों और धंधेबाजों के लिए यह बड़े फायदे का आयोजन बन कर उभरा है।
अब तो भगवती जागरण करने वाली पार्टियां भी पूर्ण रूप से व्यावसायिक हो गई है। पहले जहाँ ५०० से १००० रुपयों में ही ऐसे आयोजन हो जाया करते थे वहीं अब छोटी मोटी पार्टियाँ भी १०००० -१५००० रुपयों के नीचे बात ही नही करती है। इस के अलावा अन्य खर्चों की तो बात ही अलग है।
कहीं बर्फानी गुफाओं का रूप प्रस्तुत करने के लिए बर्फ की सिल्लियाँ रख दी जाती है, तो कहीं कलाकार स्वयं मातारानी का रूप धारण कर लेते है। माता के विशाल दरबार का निर्माण करवा किसी कोने में पुरोहित रुपी व्यक्ति को बैठा दिया जाता है जो लोगों की आस्था अर्थात चढावे को एकत्र करता है।
बड़े बड़े शहरो में तो इन जागरणों का रूप तो और हाईटेक हो गया है। शहरों में महीनो पहले से चंदा एकत्रित किया जाने लगता है ,मुनादी करवाई जाती है ,विज्ञापन दिए जाते है। और तो और फिल्मी गायक तथा गायिकाएं इन मौकों पर विशेष रूप से मोटी रकम देकर आमंत्रित किए जाते है। तालियाँ पीटते समाज सुधारक, नेतागण, फिल्मी हस्तियां तथा आम जनता इन जागरणों में स्पष्ट ही देखे जा सकते है । इस समय इनमे से किसी भी व्यक्ति को व्यर्थ के होने वाले टोटके तथा ध्वनि प्रदूषण की कोई चिंता नही रहती है ।
यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है, जिस ऑर्केस्ट्रा के तीव्र शोर को सुन आम आदमी को भी खुशी नही मिलती है,वहां देवी देवताओं का प्रसन्न होना तो बहुत दूर की बात है। इसलिए अब ऐसे आयोजन का मंतव्य सिर्फ़ नाम ,शोहरत और पैसा कमाना ही रह गया है। जितना धन ऐसे आयोजनों पर खर्च किया जाता है उससे कई कल्याणकारी योजनायें चलाई जा सकती है ,अनेक जरुरतमंदो की मदद की जा सकती है परन्तु धर्म के ठेकेदारों को यह सब मंजूर नही है क्यूंकि पैसा कमाने का इससे सीधा तथा सरल उपाय उन्हें दिखाई ही नही देता।
जगराते की रात हम आँखें खोले पूरे तन ,मन ,धन भगवान् में ध्यान लगाते है परन्तु बाहरी दिखावों ,आडम्बरों की सच्चाई को जानने के समय हम अपनी आँखें बंद कर लेते है व् उसी चक्र का हिस्सा बन कर घूमने लगते है जिसमे समूची दुनिया घूम रही है ।
Friday, July 4, 2008
महंगाई पर हाय तौबा

Monday, June 30, 2008
धर्म की राजनीति
अब सारी कवायद देश में नई लोकतांत्रिक सरकार के गठन व नया संविधान बनने को ले कर चल रही है। लेकिन उधर कुछ हिंदूवादी संगठन नेपाल के हिंदू राष्ट्र के दर्जे को बरक़रार रखने के लिए धरने तथा प्रदर्शन कर रहे हैउनका कहना है कि नेपाल के पुराने हिंदू राष्ट्र के दर्जे को कायम रहना चाहिए।
उल्लेखनीय है कि विश्व में नेपाल ही एक ऐसा देश है जिसे हिंदू राष्ट्र का दर्जा प्राप्त है। हिंदू राजशाही ने यहाँ धर्म को खूब संरक्षण दिया। अब हिंदू संगठनो को धर्म के लुप्त होने का खतरा दिख रहा है क्यूंकि माओवादी नास्तिक माने जाते है तथा धर्म के पाखंडो को वे किसी भी रूप में स्वीकार नही कर पाएंगे । इससे धर्म की दुकानदारी उखड़ने का खतरा पैदा हो गया है ।
Tuesday, May 13, 2008
अमन की चाह

हमारे ह्रदय मे रहने वाला एक वृद्ध जिसे हम हिंदुस्तान नाम से संबोधित करते है ,शायद २८ राज्यों की गलियों मे कहीं खो गया है । हिमालय जैसा विशाल कद ,शरीर पर वनस्पतियों के लहलहाते हरे बाल तथा त्वचा के आवरण पर झलकती नीली आसमानी नसें ही इसकी पहचान है । ह्रदय का धनी और खुशमिजाज यह देश राज्यों की राजनीति मे खो गया है । हिंसा तथा जातिवाद के सागर मे हिचकोले खा रहा है । हिन्दुस्तान कि संस्कृति आत्म
प्रदर्शन के बोझ के नीचे दब कर नष्ट होती जा रही है ।
अंत मे यही निवेदन किया जा सकता है कि सभी देशवासी अपने अमूल्य समय मे से कुछ लम्हे निकल कर वास्तविक भारत को खोजने मे मदद करें,ताकि सम्पूर्ण ब्रम्हांड मे हिन्दुस्तान अपने मूल्यों ,संस्कारों , तथा सभ्यता कि विजय पताका फ़हरा सके।
