आवारा मसीहा

Wednesday, February 3, 2010

मेरा दोष है..........

मै मानता हूँ कि कहीं ना कहीं पत्रकारिता को कुछ लोग एक व्यवसाय के रूप में देखते हैं। लेकिन आज भी ऐसे पुरोधा मौजूद हैं जिनके लिये पत्रकारिता एक जुनून है, जज्बा है। पत्रकार की दिनचर्या निश्चित नही होती है। समाज को सच्चा आईना दिखाने के लिए वह गर्मी और सर्दी की परवाह किये बगैर निरन्तर अपने कार्य में लगा रहता है। लेकिन इसे एक विडम्बना समझे या एक कड़वा सच कि लोग जागरूक ना होकर एक दूसरे पर उंगली उठाने लगे हैं। कहीं कूड़ा फैलाने की बात हो या किसी स्त्री का बलात्कार, लोग हमेशा दूसरों को दोषी करार देते है, क्या प्रेस और मीडिया को दोषी कह देने से समाज का सुधार हो जायेगा। बूंद-बूंद से सागर बनता है और एकता में बल है सिर्फ कहने की बातें नही हैं, इसके लिए हम सबको एक साथ मिलकर आगे आना होगा। समाज कि हर समस्या के लिये हम समान रूप से जिम्मेदार है।
posted by ॐĢĂÛŔΔ٧ॐ at 12:29 AM 0 comments

Tuesday, February 2, 2010

पढाई का बोझ.............




लगता है सही मायनो में 3 इडियटस फिल्म का अर्थ, केंद्रीय विद्यालय संगठन ही समझ पाया है। केंद्रीय विद्यालय संगठन द्वारा कक्षा के हिसाब से बस्ते का भार तय किया जाना शायद विद्यार्थियों का कुछ भार कम कर दे।

बचपन से ही किताबों के बीच उलझा हुआ बच्चा अपनी प्रतिभा को पहचान नही पाता, न ही अपना लक्ष्य तय कर पाता है। किताबों के बीच घिरा होने के कारण वह खेल कूद, तथा अन्य कई चीजो से वंचित रह जाता हैं। बचपन से ही माँ-बाप का सपना पूरा करने की जिद में उसका अपना सपना तो कही खो सा जाता है। इसके लिये सिर्फ माँ- बाप या कोई एक व्यक्ति नही है,बल्कि पूरा समाज इसके लिये जिम्मेदार है।

हम रटते-पढ़ते जिन्दगी की दौड़ में आगे तो निकल जाते हैं, पर पीछे मुड़ कर देखने पर कुछ नजर नही आता है। किताबें ज्ञान का भंडार तो हैं, पर इस भंडार में कहीं न कहीं किसी मासूम का बचपन दबा हुआ है।

खो गया बचपन कहीं,जिन्दगी की दौड़ में,
रह गया अकेला यहीं,प्रतियोगीता कि होड़ में।
क्या मेरा अधूरा बचपन कभी लौट कर आयेगा,
यह सवाल अब उम्र भर मुझे चोट पहुचायेगा .
posted by ॐĢĂÛŔΔ٧ॐ at 8:45 AM 0 comments

Sunday, September 20, 2009


आप सब यह सोच रहे होंगे की मैं इतने लंबे अन्तराल के बाद फ़िर ब्लॉग लिखने क्यों आया हूँ , लेकिन लगातार हो रहे अन्याय और वारदाते मुझे मजबूर करती हैं की अपनी भावना को आप लोगो के समक्ष रखूँ । रोज हो रहा आत्याचार अब हम भारतियों की आदत बन चुका है । हम भारतीये दूसरो की बुराइयाँ तो देख लेते हैं परन्तु अपने मन चिंतन में कभी नही झाकते हैं। कल तक जिस भारत में हम गर्व से कहते थे की हम भारतीय हैं , और यह भारत हमारा है , वहीं आज की हालत यह है की लोग इस बात पर लड़ रहे हैं की मुंबई मेरी है , या यु पी मेरी है । कल तक जहाँ सिर्फ़ रंग को लेकर भेद किया जाता था ,वहीं आज भाषा और धर्म को लेकर भी भेद किया जाने लगा है।


मैं समझता हूँ हमारे भारतवासी बहुत नादान हैं किसी के भी बहकावे में आने में इन्हे वक्त नही लगता है । जैसे ही कोई नेता अपना वोट बैंक बढ़ने के लिए जाती और धर्म क नाम पर बरगलाता है वैसे ही ये सरे काम काज छोड़ तुंरत दूसरो की निंदा करने में लग जाते हैं। ये भूल जाते हैं की हम भारतीये हैं इन्हे सिर्फ़ अपने मूल की ही चिंता रहती है।बस मेरा सवाल ये है की हम कब समझेंगे की हमें अब धर्म या राज्य क नाम पर लड़ना बंद कर देना चाहिए । यह पूरा देश ही हमारा घर है और हमें मिलकर इसके विकास का पथ तयार करना चाहिए।
posted by ॐĢĂÛŔΔ٧ॐ at 11:28 PM 0 comments

Friday, July 11, 2008

यह कैसा जागरण ???


भारत एक ऐसा राष्ट्र है जहाँ सभी धर्मो को समान मान्यता प्राप्त है। यहाँ धर्म के नाम पर जो कुछ भी किया जाए सब जायज माना जाता है। अपनी तथाकथित आस्था और बेसिरपैर के अन्धविश्वास के लिए यहाँ के रूढिवादी लोग किसी भी हद तक जा सकते है। वे देवताओं,कुलदेविओं,तथा अपने पूर्वजों को खुश करने में कोई कसर नही छोड़ना चाहते है।
"पुण्य " कमाने और "फल "पाने के लिए लोगों ने कई साधन अपना रखे है। इन्ही में से एक प्रमुख साधन है-भगवती जागरण। इन जागरणों में रात रात भर जाग कर अन्य किसी को कुछ हासिल होता हो या ना होता हो,मगर जागरण करने वाली पार्टियों और धंधेबाजों के लिए यह बड़े फायदे का आयोजन बन कर उभरा है।
अब तो भगवती जागरण करने वाली पार्टियां भी पूर्ण रूप से व्यावसायिक हो गई है। पहले जहाँ ५०० से १००० रुपयों में ही ऐसे आयोजन हो जाया करते थे वहीं अब छोटी मोटी पार्टियाँ भी १०००० -१५००० रुपयों के नीचे बात ही नही करती है। इस के अलावा अन्य खर्चों की तो बात ही अलग है।
कहीं बर्फानी गुफाओं का रूप प्रस्तुत करने के लिए बर्फ की सिल्लियाँ रख दी जाती है, तो कहीं कलाकार स्वयं मातारानी का रूप धारण कर लेते है। माता के विशाल दरबार का निर्माण करवा किसी कोने में पुरोहित रुपी व्यक्ति को बैठा दिया जाता है जो लोगों की आस्था अर्थात चढावे को एकत्र करता है।
बड़े बड़े शहरो में तो इन जागरणों का रूप तो और हाईटेक हो गया है। शहरों में महीनो पहले से चंदा एकत्रित किया जाने लगता है ,मुनादी करवाई जाती है ,विज्ञापन दिए जाते है। और तो और फिल्मी गायक तथा गायिकाएं इन मौकों पर विशेष रूप से मोटी रकम देकर आमंत्रित किए जाते है। तालियाँ पीटते समाज सुधारक, नेतागण, फिल्मी हस्तियां तथा आम जनता इन जागरणों में स्पष्ट ही देखे जा सकते है । इस समय इनमे से किसी भी व्यक्ति को व्यर्थ के होने वाले टोटके तथा ध्वनि प्रदूषण की कोई चिंता नही रहती है ।
यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है, जिस ऑर्केस्ट्रा के तीव्र शोर को सुन आम आदमी को भी खुशी नही मिलती है,वहां देवी देवताओं का प्रसन्न होना तो बहुत दूर की बात है। इसलिए अब ऐसे आयोजन का मंतव्य सिर्फ़ नाम ,शोहरत और पैसा कमाना ही रह गया है। जितना धन ऐसे आयोजनों पर खर्च किया जाता है उससे कई कल्याणकारी योजनायें चलाई जा सकती है ,अनेक जरुरतमंदो की मदद की जा सकती है परन्तु धर्म के ठेकेदारों को यह सब मंजूर नही है क्यूंकि पैसा कमाने का इससे सीधा तथा सरल उपाय उन्हें दिखाई ही नही देता।
जगराते की रात हम आँखें खोले पूरे तन ,मन ,धन भगवान् में ध्यान लगाते है परन्तु बाहरी दिखावों ,आडम्बरों की सच्चाई को जानने के समय हम अपनी आँखें बंद कर लेते है व् उसी चक्र का हिस्सा बन कर घूमने लगते है जिसमे समूची दुनिया घूम रही है ।
posted by ॐĢĂÛŔΔ٧ॐ at 11:35 AM 1 comments

Friday, July 4, 2008

महंगाई पर हाय तौबा



मुद्रास्फीति की दर में अप्रत्याशित उछाल आने के बाद सप्रंग शासन तंत्र में हड़कंप मचना ही था लेकिन इस हाय तौबा में भी सरकार महंगाई पर काबू पाने में सफल नही हो पाई है। महंगाई रूपी घोड़े की लगाम खींचने के बजाये नेतागड़ मीडिया को खींच कर घिसे पिटे बयान देने में अधिक रूचि दिखा रहे है । गनीमत है की अभी तक केन्द्र सरकार ने पूर्णतया पल्ला नही झाड़ा है । वित्त मंत्री अभी भी अपनी जादू की छड़ी का छलावा पेश करते रहते है । भले ही सप्रंग सरकार बड़े बड़े अर्थशास्त्रियों से भरी है परन्तु प्रतीत होता है कि वे सभी मात्र किताबी विद्वान है क्यूंकि यदि उन्हें व्यावहारिक अर्थशास्त्र की तनिक भी समझ होती तो देश की जनता महंगाई की मार से बची रहती।


सप्रंग सरकार के स्तंभ वाम दल भी ऐसे प्रदर्शन कर रहे है जैसे उनका इस मसले से कोई लेना देना ही नही है । महंगाई की जो मार आम जनता झेल रही है वास्तव में एक दिन की उपज नही है । खाद्यानों का आभाव ,कृषि के प्रति भेदभावपूर्ण रीति तथा आर्थिक व् प्रशासनिक सुधारो का ठंडे बसते में जाना इस बात का संकेत था की देश महंगाई की इस विकराल समस्या से ग्रसित होने वाला है लेकिन सरकार ऐसे ज़ाहिर कर रही है मानो महंगाई आस्मां से अचानक टपक पड़ी हो । जबकि सच तो यह है की महंगाई से निपटने की माँ तो पहले कोई तयारी थी और न अब है । यह तो वही हाल हो गया -
"अंधेर नगरी चौपट राजा ,
सौ सेर भाजी सौ सेर खाजा"
posted by ॐĢĂÛŔΔ٧ॐ at 12:16 PM 0 comments

Monday, June 30, 2008

धर्म की राजनीति

११ जून २००८,वह ऐतिहासिक दिन था जब २४० साल पुरानी राजशाही को खत्म कर के राजा ज्ञानेंद्र से नारायणहिती महल खाली करवा कर सरकार ने उसे अपने कब्जे में कर लिया। महल को अब राष्ट्रीय सम्पति माना जाएगा और राजा की हैसियत अब एक आम आदमी की रहेगी।
अब सारी कवायद देश में नई लोकतांत्रिक सरकार के गठन व नया संविधान बनने को ले कर चल रही है। लेकिन उधर कुछ हिंदूवादी संगठन नेपाल के हिंदू राष्ट्र के दर्जे को बरक़रार रखने के लिए धरने तथा प्रदर्शन कर रहे हैउनका कहना है कि नेपाल के पुराने हिंदू राष्ट्र के दर्जे को कायम रहना चाहिए।
उल्लेखनीय है कि विश्व में नेपाल ही एक ऐसा देश है जिसे हिंदू राष्ट्र का दर्जा प्राप्त है। हिंदू राजशाही ने यहाँ धर्म को खूब संरक्षण दिया। अब हिंदू संगठनो को धर्म के लुप्त होने का खतरा दिख रहा है क्यूंकि माओवादी नास्तिक माने जाते है तथा धर्म के पाखंडो को वे किसी भी रूप में स्वीकार नही कर पाएंगे । इससे धर्म की दुकानदारी उखड़ने का खतरा पैदा हो गया है ।
posted by ॐĢĂÛŔΔ٧ॐ at 11:21 AM 0 comments

Tuesday, May 13, 2008

अमन की चाह






हमारे ह्रदय मे रहने वाला एक वृद्ध जिसे हम हिंदुस्तान नाम से संबोधित करते है ,शायद २८ राज्यों की गलियों मे कहीं खो गया है । हिमालय जैसा विशाल कद ,शरीर पर वनस्पतियों के लहलहाते हरे बाल तथा त्वचा के आवरण पर झलकती नीली आसमानी नसें ही इसकी पहचान है । ह्रदय का धनी और खुशमिजाज यह देश राज्यों की राजनीति मे खो गया है । हिंसा तथा जातिवाद के सागर मे हिचकोले खा रहा है । हिन्दुस्तान कि संस्कृति आत्म

प्रदर्शन के बोझ के नीचे दब कर नष्ट होती जा रही है ।


अंत मे यही निवेदन किया जा सकता है कि सभी देशवासी अपने अमूल्य समय मे से कुछ लम्हे निकल कर वास्तविक भारत को खोजने मे मदद करें,ताकि सम्पूर्ण ब्रम्हांड मे हिन्दुस्तान अपने मूल्यों ,संस्कारों , तथा सभ्यता कि विजय पताका फ़हरा सके।

posted by ॐĢĂÛŔΔ٧ॐ at 12:35 AM 1 comments