आवारा मसीहा

Friday, July 11, 2008

यह कैसा जागरण ???


भारत एक ऐसा राष्ट्र है जहाँ सभी धर्मो को समान मान्यता प्राप्त है। यहाँ धर्म के नाम पर जो कुछ भी किया जाए सब जायज माना जाता है। अपनी तथाकथित आस्था और बेसिरपैर के अन्धविश्वास के लिए यहाँ के रूढिवादी लोग किसी भी हद तक जा सकते है। वे देवताओं,कुलदेविओं,तथा अपने पूर्वजों को खुश करने में कोई कसर नही छोड़ना चाहते है।
"पुण्य " कमाने और "फल "पाने के लिए लोगों ने कई साधन अपना रखे है। इन्ही में से एक प्रमुख साधन है-भगवती जागरण। इन जागरणों में रात रात भर जाग कर अन्य किसी को कुछ हासिल होता हो या ना होता हो,मगर जागरण करने वाली पार्टियों और धंधेबाजों के लिए यह बड़े फायदे का आयोजन बन कर उभरा है।
अब तो भगवती जागरण करने वाली पार्टियां भी पूर्ण रूप से व्यावसायिक हो गई है। पहले जहाँ ५०० से १००० रुपयों में ही ऐसे आयोजन हो जाया करते थे वहीं अब छोटी मोटी पार्टियाँ भी १०००० -१५००० रुपयों के नीचे बात ही नही करती है। इस के अलावा अन्य खर्चों की तो बात ही अलग है।
कहीं बर्फानी गुफाओं का रूप प्रस्तुत करने के लिए बर्फ की सिल्लियाँ रख दी जाती है, तो कहीं कलाकार स्वयं मातारानी का रूप धारण कर लेते है। माता के विशाल दरबार का निर्माण करवा किसी कोने में पुरोहित रुपी व्यक्ति को बैठा दिया जाता है जो लोगों की आस्था अर्थात चढावे को एकत्र करता है।
बड़े बड़े शहरो में तो इन जागरणों का रूप तो और हाईटेक हो गया है। शहरों में महीनो पहले से चंदा एकत्रित किया जाने लगता है ,मुनादी करवाई जाती है ,विज्ञापन दिए जाते है। और तो और फिल्मी गायक तथा गायिकाएं इन मौकों पर विशेष रूप से मोटी रकम देकर आमंत्रित किए जाते है। तालियाँ पीटते समाज सुधारक, नेतागण, फिल्मी हस्तियां तथा आम जनता इन जागरणों में स्पष्ट ही देखे जा सकते है । इस समय इनमे से किसी भी व्यक्ति को व्यर्थ के होने वाले टोटके तथा ध्वनि प्रदूषण की कोई चिंता नही रहती है ।
यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है, जिस ऑर्केस्ट्रा के तीव्र शोर को सुन आम आदमी को भी खुशी नही मिलती है,वहां देवी देवताओं का प्रसन्न होना तो बहुत दूर की बात है। इसलिए अब ऐसे आयोजन का मंतव्य सिर्फ़ नाम ,शोहरत और पैसा कमाना ही रह गया है। जितना धन ऐसे आयोजनों पर खर्च किया जाता है उससे कई कल्याणकारी योजनायें चलाई जा सकती है ,अनेक जरुरतमंदो की मदद की जा सकती है परन्तु धर्म के ठेकेदारों को यह सब मंजूर नही है क्यूंकि पैसा कमाने का इससे सीधा तथा सरल उपाय उन्हें दिखाई ही नही देता।
जगराते की रात हम आँखें खोले पूरे तन ,मन ,धन भगवान् में ध्यान लगाते है परन्तु बाहरी दिखावों ,आडम्बरों की सच्चाई को जानने के समय हम अपनी आँखें बंद कर लेते है व् उसी चक्र का हिस्सा बन कर घूमने लगते है जिसमे समूची दुनिया घूम रही है ।
posted by ॐĢĂÛŔΔ٧ॐ at 11:35 AM 1 comments

Friday, July 4, 2008

महंगाई पर हाय तौबा



मुद्रास्फीति की दर में अप्रत्याशित उछाल आने के बाद सप्रंग शासन तंत्र में हड़कंप मचना ही था लेकिन इस हाय तौबा में भी सरकार महंगाई पर काबू पाने में सफल नही हो पाई है। महंगाई रूपी घोड़े की लगाम खींचने के बजाये नेतागड़ मीडिया को खींच कर घिसे पिटे बयान देने में अधिक रूचि दिखा रहे है । गनीमत है की अभी तक केन्द्र सरकार ने पूर्णतया पल्ला नही झाड़ा है । वित्त मंत्री अभी भी अपनी जादू की छड़ी का छलावा पेश करते रहते है । भले ही सप्रंग सरकार बड़े बड़े अर्थशास्त्रियों से भरी है परन्तु प्रतीत होता है कि वे सभी मात्र किताबी विद्वान है क्यूंकि यदि उन्हें व्यावहारिक अर्थशास्त्र की तनिक भी समझ होती तो देश की जनता महंगाई की मार से बची रहती।


सप्रंग सरकार के स्तंभ वाम दल भी ऐसे प्रदर्शन कर रहे है जैसे उनका इस मसले से कोई लेना देना ही नही है । महंगाई की जो मार आम जनता झेल रही है वास्तव में एक दिन की उपज नही है । खाद्यानों का आभाव ,कृषि के प्रति भेदभावपूर्ण रीति तथा आर्थिक व् प्रशासनिक सुधारो का ठंडे बसते में जाना इस बात का संकेत था की देश महंगाई की इस विकराल समस्या से ग्रसित होने वाला है लेकिन सरकार ऐसे ज़ाहिर कर रही है मानो महंगाई आस्मां से अचानक टपक पड़ी हो । जबकि सच तो यह है की महंगाई से निपटने की माँ तो पहले कोई तयारी थी और न अब है । यह तो वही हाल हो गया -
"अंधेर नगरी चौपट राजा ,
सौ सेर भाजी सौ सेर खाजा"
posted by ॐĢĂÛŔΔ٧ॐ at 12:16 PM 0 comments